क्या कम उम्र में भी आ सकता है स्ट्रोक? - युवाओं को जाननी चाहिए ये जरूरी बातें
स्ट्रोक (Stroke) को अक्सर बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी माना जाता है, लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है, यहाँ तक कि युवाओं और युवा वयस्कों में भी। अचानक बोलने में परेशानी होना, शरीर के एक तरफ कमजोरी महसूस होना, चेहरे का एक हिस्सा झुक जाना या अचानक देखने में दिक्कत होना स्ट्रोक के चेतावनी संकेत हो सकते हैं।
युवाओं में स्ट्रोक के लक्षणों को कभी-कभी तनाव, माइग्रेन, थकान या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे इलाज मिलने में देरी हो सकती है। स्ट्रोक के दौरान समय पर चिकित्सा सहायता मिलना मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को कम करने और रिकवरी की संभावनाओं को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस लेख में जानिए कि कम उम्र में स्ट्रोक क्यों हो सकता है, इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं, किन लोगों को अधिक जोखिम रहता है और स्ट्रोक से बचाव के लिए कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं।
स्ट्रोक क्या है?
स्ट्रोक एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है या मस्तिष्क की रक्त वाहिका फट जाती है। मस्तिष्क की कोशिकाओं को लगातार ऑक्सीजन की जरूरत होती है। रक्त की आपूर्ति बाधित होने पर ये कोशिकाएँ कुछ ही समय में क्षतिग्रस्त होने लगती हैं।
स्ट्रोक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:
1. इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic Stroke)
यह तब होता है जब रक्त का थक्का या कोई अन्य रुकावट मस्तिष्क तक रक्त पहुँचाने वाली धमनी को बंद कर देती है। यह स्ट्रोक का सबसे आम प्रकार है।
2. हेमरेजिक स्ट्रोक (Hemorrhagic Stroke)
यह तब होता है जब मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और उसके आसपास या मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव होने लगता है। अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर और कुछ रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याएँ इसका कारण बन सकती हैं।
दोनों प्रकार के स्ट्रोक में तुरंत चिकित्सा सहायता जरूरी है। इनके उपचार अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए सही निदान के लिए अस्पताल में जाँच आवश्यक है।
क्या युवाओं को स्ट्रोक हो सकता है?
हाँ, स्ट्रोक 18 से 45 वर्ष की उम्र के लोगों में भी हो सकता है। हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम सामान्यतः बढ़ता है, लेकिन कम उम्र होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति स्ट्रोक से पूरी तरह सुरक्षित है।
युवाओं में स्ट्रोक के पीछे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान, कुछ हृदय संबंधी समस्याएँ, रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति और मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं से जुड़ी असामान्यताएँ हो सकती हैं। कुछ मामलों में कई जाँचों के बाद भी इसका स्पष्ट कारण पता नहीं चल पाता।
इसलिए यदि किसी युवा व्यक्ति में स्ट्रोक के लक्षण दिखाई दें, तो उम्र की परवाह किए बिना तुरंत इमरजेंसी चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
कम उम्र में स्ट्रोक होने के प्रमुख कारण
1. हाई ब्लड प्रेशर
उच्च रक्तचाप स्ट्रोक का एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। लंबे समय तक ब्लड प्रेशर नियंत्रित न रहने से रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँच सकता है और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है। युवाओं में भी नियमित ब्लड प्रेशर जाँच महत्वपूर्ण है, खासकर यदि परिवार में हाई ब्लड प्रेशर या हृदय रोग का इतिहास हो।
2. धूम्रपान और तंबाकू का सेवन
सिगरेट, बीड़ी और अन्य तंबाकू उत्पाद रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँचा सकते हैं। धूम्रपान से रक्त के थक्के बनने और हृदय व रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। वेपिंग या ई-सिगरेट को भी जोखिम-मुक्त विकल्प नहीं मानना चाहिए।
3. डायबिटीज और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल
डायबिटीज और असामान्य कोलेस्ट्रॉल का स्तर रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। यदि इन समस्याओं का समय पर पता न चले या इन्हें नियंत्रित न रखा जाए, तो कम उम्र में भी स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है।
4. हृदय संबंधी समस्याएँ
कुछ हृदय रोगों, जैसे एट्रियल फिब्रिलेशन (अनियमित दिल की धड़कन) और कुछ जन्मजात हृदय संबंधी समस्याओं में रक्त के थक्के बनने का जोखिम बढ़ सकता है। ये थक्के मस्तिष्क तक पहुँचकर इस्केमिक स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं।
5. मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में असामान्यताएँ
कुछ युवाओं में ब्रेन एन्यूरिज्म (Brain Aneurysm) या आर्टेरियोवेनस मैलफॉर्मेशन (AVM) जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इन स्थितियों में रक्त वाहिका फटने और मस्तिष्क में रक्तस्राव होने का खतरा हो सकता है।
6. रक्त के थक्के बनने से जुड़ी स्थितियाँ
कुछ आनुवंशिक या अन्य चिकित्सकीय स्थितियाँ रक्त के असामान्य रूप से थक्के बनने की संभावना बढ़ा सकती हैं। कुछ मामलों में ऑटोइम्यून बीमारियाँ या विशेष रक्त संबंधी विकार भी स्ट्रोक के जोखिम से जुड़े हो सकते हैं।
7. मोटापा और शारीरिक गतिविधि की कमी
लंबे समय तक निष्क्रिय रहना, असंतुलित खानपान और मोटापा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज तथा अन्य हृदय संबंधी जोखिम कारकों को बढ़ा सकते हैं। हालांकि, केवल मोटापा या निष्क्रियता ही किसी व्यक्ति में स्ट्रोक होने का निश्चित कारण नहीं है।
8. शराब और कुछ नशीले पदार्थ
अत्यधिक शराब का सेवन और कोकीन या एम्फेटामिन जैसे कुछ नशीले पदार्थ ब्लड प्रेशर, हृदय की कार्यप्रणाली और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकते हैं। इससे स्ट्रोक का जोखिम बढ़ सकता है।
9. गर्दन की रक्त वाहिका में चोट
कुछ मामलों में गर्दन की रक्त वाहिका की दीवार में चोट या दरार, जिसे आर्टेरियल डिसेक्शन (Arterial Dissection) कहा जाता है, स्ट्रोक का कारण बन सकती है। यह कभी-कभी गर्दन की चोट या अचानक गर्दन पर दबाव पड़ने के बाद हो सकता है। गर्दन में दर्द के साथ अचानक न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई दें, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लें।
10. गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि
गर्भावस्था और प्रसव के बाद कुछ समय तक रक्त के थक्के बनने तथा ब्लड प्रेशर से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम बढ़ सकता है। गर्भावस्था के दौरान या प्रसव के बाद अचानक गंभीर सिरदर्द, कमजोरी, बोलने में परेशानी या देखने में बदलाव होने पर इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज न करें।
युवाओं में स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण
स्ट्रोक के लक्षण अक्सर अचानक शुरू होते हैं। इन्हें पहचानने के लिए FAST नियम उपयोगी है।
FAST नियम से स्ट्रोक पहचानें
- F – Face (चेहरा): क्या मुस्कुराने पर चेहरे का एक हिस्सा झुक रहा है?
- A – Arms (बाँहें): क्या दोनों हाथ उठाने पर एक हाथ नीचे गिर रहा है या उसमें अचानक कमजोरी है?
- S – Speech (बोलना): क्या बोलने में परेशानी हो रही है, शब्द अस्पष्ट हैं या बात समझने में दिक्कत है?
- T – Time (समय): इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत एम्बुलेंस बुलाएँ और अस्पताल पहुँचें।
स्ट्रोक के अन्य संभावित लक्षण भी हैं:
- अचानक बहुत तेज सिरदर्द, विशेषकर यदि यह पहले कभी महसूस न हुआ हो।
- अचानक एक या दोनों आँखों से देखने में परेशानी।
- अचानक चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना या चलने में कठिनाई।
- शरीर के एक तरफ चेहरे, हाथ या पैर में सुन्नपन या कमजोरी।
- अचानक भ्रम, बोलने या दूसरों की बात समझने में कठिनाई।
- अचानक समन्वय बिगड़ना या चलने में अस्थिरता।
महत्वपूर्ण: लक्षण कुछ मिनटों में ठीक हो जाएँ, तब भी इन्हें नजरअंदाज न करें। यह ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) हो सकता है, जिसे कभी-कभी मिनी-स्ट्रोक कहा जाता है। यह भविष्य में स्ट्रोक होने की चेतावनी हो सकती है और इसके लिए तत्काल चिकित्सा मूल्यांकन जरूरी है।
युवाओं में स्ट्रोक का पता कैसे लगाया जाता है?
स्ट्रोक का संदेह होने पर अस्पताल में डॉक्टर लक्षणों की शुरुआत का समय, मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जाँच के आधार पर आगे की जाँच तय करते हैं। संभावित जाँचों में शामिल हैं:
- CT स्कैन: मस्तिष्क में रक्तस्राव की पहचान करने में मदद करता है।
- MRI ब्रेन: मस्तिष्क के ऊतकों में हुए बदलाव का पता लगाने में उपयोगी हो सकता है।
- CT या MR एंजियोग्राफी: मस्तिष्क और गर्दन की रक्त वाहिकाओं का मूल्यांकन करने के लिए की जा सकती है।
- ब्लड टेस्ट: ब्लड शुगर, रक्त संबंधी समस्याओं और अन्य संभावित कारणों की जाँच के लिए।
- ECG और हृदय की जाँच: हृदय की धड़कन या अन्य हृदय संबंधी समस्याओं का पता लगाने के लिए।
हर मरीज को सभी जाँचों की आवश्यकता नहीं होती। डॉक्टर लक्षणों, उनकी गंभीरता और संभावित कारणों के अनुसार जाँच निर्धारित करते हैं। स्ट्रोक के संदेह में जाँच के लिए अस्पताल पहुँचने में देरी नहीं करनी चाहिए।
स्ट्रोक का इलाज कैसे किया जाता है?
स्ट्रोक का उपचार उसके प्रकार, गंभीरता, लक्षण शुरू होने के समय और मरीज की चिकित्सकीय स्थिति पर निर्भर करता है।
1. इस्केमिक स्ट्रोक का उपचार
चुने हुए मरीजों में डॉक्टर रक्त का थक्का तोड़ने वाली दवा (थ्रोम्बोलाइसिस) दे सकते हैं। कुछ मरीजों में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी नामक प्रक्रिया से रक्त वाहिका में फँसे थक्के को निकाला जा सकता है।
इन उपचारों के लिए समय और चिकित्सकीय पात्रता महत्वपूर्ण हैं। हर मरीज इन प्रक्रियाओं के लिए उपयुक्त नहीं होता।
2. हेमरेजिक स्ट्रोक का उपचार
इस प्रकार के स्ट्रोक में रक्तस्राव को नियंत्रित करना, ब्लड प्रेशर का उचित प्रबंधन और मस्तिष्क पर पड़ने वाले दबाव को कम करना महत्वपूर्ण हो सकता है। कुछ मामलों में न्यूरोसर्जरी या रक्त वाहिका से जुड़ी अन्य प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ सकती है।
3. दवाएँ और चिकित्सकीय निगरानी
डॉक्टर स्ट्रोक के प्रकार और कारण के अनुसार दवाएँ निर्धारित कर सकते हैं। इनमें कुछ मरीजों के लिए रक्त के थक्के बनने से रोकने वाली दवाएँ, ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने वाली दवाएँ या कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएँ शामिल हो सकती हैं। ये दवाएँ सभी मरीजों के लिए एक जैसी नहीं होतीं।
स्ट्रोक के संदेह में स्वयं एस्पिरिन या कोई अन्य दवा न लें, क्योंकि यदि मस्तिष्क में रक्तस्राव हो रहा हो तो कुछ दवाएँ नुकसान पहुँचा सकती हैं।
4. स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन
स्ट्रोक के बाद कुछ लोगों को बोलने, चलने, संतुलन बनाने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। ऐसे मामलों में जरूरत के अनुसार फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी मदद कर सकती हैं। रिकवरी की गति और सीमा व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग होती है।
कम उम्र में स्ट्रोक से बचाव कैसे करें?
हर स्ट्रोक को रोका नहीं जा सकता, लेकिन जोखिम कारकों को नियंत्रित करने से इसकी संभावना कम करने में मदद मिल सकती है।
1. ब्लड प्रेशर नियमित रूप से जाँचें
हाई ब्लड प्रेशर में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता। नियमित जाँच करवाएँ और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसे नियंत्रित रखें।
2. धूम्रपान छोड़ें
धूम्रपान और तंबाकू का सेवन बंद करना रक्त वाहिकाओं और हृदय के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण कदम है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से धूम्रपान छोड़ने में मदद लेने के विकल्पों पर बात करें।
3. संतुलित आहार अपनाएँ
अपने भोजन में शामिल करें:
- हरी पत्तेदार सब्जियाँ और अन्य मौसमी सब्जियाँ।
- साबुत अनाज, जैसे ओट्स, दलिया और साबुत गेहूँ।
- फल और दालें।
- सीमित मात्रा में मेवे और बीज।
- प्रोटीन के लिए दालें, बीन्स, अंडे, मछली या अन्य उपयुक्त विकल्प।
नमक, अत्यधिक तले हुए खाद्य पदार्थ, ट्रांस फैट और ज्यादा चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें। यदि आपको हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या किडनी की बीमारी है, तो अपनी जरूरतों के अनुसार डाइट प्लान बनवाएँ।
4. नियमित शारीरिक गतिविधि करें
यदि आपकी सेहत इसकी अनुमति देती है, तो सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने का लक्ष्य रखें, जैसे तेज चलना या साइकिल चलाना। शुरुआत धीरे-धीरे करें और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार गतिविधि चुनें।
5. डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें
समय-समय पर आवश्यक जाँच करवाएँ। यदि ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार खानपान, व्यायाम और उपचार अपनाएँ।
6. पर्याप्त नींद लें
नियमित नींद का समय बनाएँ और अधिकांश वयस्कों के लिए हर रात लगभग 7–9 घंटे सोने का लक्ष्य रखें। यदि तेज खर्राटे आते हैं, नींद में साँस रुकती है या दिन में अत्यधिक नींद आती है, तो डॉक्टर से सलाह लें।
7. शराब और नशीले पदार्थों से बचें
अत्यधिक शराब और अवैध नशीले पदार्थों से दूर रहना स्ट्रोक सहित कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
8. नियमित हेल्थ चेकअप करवाएँ
यदि परिवार में कम उम्र में स्ट्रोक या हृदय रोग का इतिहास है, या आपको हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हृदय संबंधी समस्या अथवा रक्त के थक्के बनने से जुड़ा विकार है, तो डॉक्टर से व्यक्तिगत जोखिम और आवश्यक जाँचों के बारे में बात करें।
स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए एक दिन का हेल्दी डाइट उदाहरण
स्ट्रोक से बचाव के लिए किसी एक विशेष भोजन पर निर्भर रहने के बजाय लंबे समय तक संतुलित खानपान अपनाना अधिक महत्वपूर्ण है। नीचे दिया गया उदाहरण सामान्य स्वस्थ वयस्क के लिए है, स्ट्रोक का इलाज या किसी बीमारी के लिए निर्धारित डाइट नहीं।
ध्यान दें: स्ट्रोक होने पर मरीज की निगलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर या स्पीच एवं स्वॉलोइंग विशेषज्ञ की सलाह के बिना सामान्य भोजन या पानी देना सुरक्षित नहीं हो सकता। मरीज की डाइट उसकी चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।
स्ट्रोक के बारे में प्रचलित गलत धारणाएँ
मिथक 1: स्ट्रोक सिर्फ बुजुर्गों को होता है
तथ्य: स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है। युवाओं में भी इसके जोखिम कारक मौजूद हो सकते हैं।
मिथक 2: फिट दिखने वाले युवाओं को स्ट्रोक नहीं हो सकता
तथ्य: अच्छी फिटनेस फायदेमंद है, लेकिन इससे सभी जोखिम समाप्त नहीं होते। कुछ हृदय संबंधी, आनुवंशिक या रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याएँ स्वस्थ दिखने वाले लोगों में भी हो सकती हैं।
मिथक 3: स्ट्रोक के लक्षण अपने आप ठीक हो जाएँ तो चिंता की जरूरत नहीं
तथ्य: थोड़ी देर में ठीक होने वाले लक्षण भी TIA के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता जरूरी है।
मिथक 4: अस्पताल जाने से पहले आराम करके देखना चाहिए
तथ्य: स्ट्रोक के लक्षणों में इंतजार करना खतरनाक हो सकता है। तुरंत एम्बुलेंस बुलाएँ और लक्षण शुरू होने का समय नोट करें।
डॉक्टर से कब संपर्क करें?
यदि आपको स्ट्रोक के जोखिम कारक हैं, जैसे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान की आदत या हृदय संबंधी समस्या, तो नियमित स्वास्थ्य जाँच और व्यक्तिगत बचाव योजना के लिए डॉक्टर से सलाह लें।
लेकिन यदि चेहरे पर अचानक कमजोरी, शरीर के एक तरफ सुन्नपन, बोलने में परेशानी, अचानक देखने में दिक्कत या संतुलन बिगड़ने जैसे लक्षण हों, तो नियमित अपॉइंटमेंट का इंतजार न करें। तुरंत एम्बुलेंस बुलाएँ और इमरजेंसी विभाग में जाएँ। स्वयं वाहन चलाकर अस्पताल न जाएँ और लक्षणों के ठीक होने का इंतजार न करें।
निष्कर्ष
स्ट्रोक केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। युवाओं में भी यह हो सकता है, और इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना समय पर उपचार पाने के लिए बेहद जरूरी है। हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना, धूम्रपान से बचना, संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना और आवश्यक स्वास्थ्य जाँच करवाना स्ट्रोक के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चेहरे पर अचानक कमजोरी, बोलने में परेशानी या शरीर के एक तरफ सुन्नपन जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज न करें। स्ट्रोक के संदेह में हर मिनट महत्वपूर्ण है—तुरंत इमरजेंसी चिकित्सा सहायता लें।
यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है और व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं है। निदान, उपचार और जोखिम मूल्यांकन के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।
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क्या 20 या 30 साल की उम्र में स्ट्रोक हो सकता है?
हाँ। 20 या 30 साल की उम्र में भी स्ट्रोक हो सकता है। इसके संभावित कारणों में हाई ब्लड प्रेशर, कुछ हृदय संबंधी समस्याएँ, रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति, धूम्रपान और रक्त वाहिकाओं की असामान्यताएँ शामिल हैं।
युवाओं में स्ट्रोक का सबसे आम कारण क्या है?
इसका कोई एक कारण सभी युवाओं पर लागू नहीं होता। हाई ब्लड प्रेशर एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। इसके अलावा धूम्रपान, डायबिटीज, हृदय रोग और रक्त के थक्के बनने से जुड़ी समस्याएँ भी भूमिका निभा सकती हैं।
क्या तनाव के कारण स्ट्रोक हो सकता है?
तनाव को अकेले स्ट्रोक का सीधा कारण मानना सही नहीं है। हालांकि, लंबे समय तक तनाव नींद, खानपान, ब्लड प्रेशर और अन्य स्वास्थ्य संबंधी आदतों को प्रभावित कर सकता है। स्ट्रोक के लक्षणों को तनाव समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्या युवाओं में स्ट्रोक के लक्षण अलग होते हैं?
मुख्य चेतावनी संकेत युवाओं और बुजुर्गों में समान हो सकते हैं, जैसे चेहरे का झुकना, एक तरफ कमजोरी, बोलने में परेशानी और अचानक देखने या संतुलन में बदलाव। युवाओं में इन लक्षणों को कभी-कभी अन्य समस्याएँ समझ लिया जाता है।
क्या स्ट्रोक से पूरी तरह ठीक हुआ जा सकता है?
रिकवरी स्ट्रोक के प्रकार, मस्तिष्क को हुए नुकसान, उपचार मिलने के समय और पुनर्वास पर निर्भर करती है। कुछ लोग काफी हद तक ठीक हो सकते हैं, जबकि अन्य को लंबे समय तक सहायता या थेरेपी की जरूरत हो सकती है। हर मरीज की रिकवरी अलग होती है।


